श्रीनगर, 14 अक्टूबर। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा है कि हिमालय भारत की जल सुरक्षा, जैव विविधता और जलवायु सुरक्षा का मूल आधार है। हिमालयी क्षेत्र न केवल देश की प्राकृतिक संपदा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण देश के सतत विकास और भविष्य की सुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक है।
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बुधवार को शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर (SKUAST-Kashmir) में आयोजित 13वें सतत पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन के समापन सत्र के लिए अपने संदेश में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की योजनाएं बनाते समय वहां की भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखना जरूरी है।
उन्होंने अपने संदेश में रेखांकित किया कि हिमालय का महत्व केवल पर्वत श्रृंखलाओं तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र देश की नदियों, जल स्रोतों, वन संपदा, वन्यजीवों और प्राकृतिक जलवायु चक्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हिमालयी क्षेत्र में होने वाले पर्यावरणीय बदलावों का प्रभाव दूर-दराज के मैदानी इलाकों तक पड़ सकता है। इसलिए इस क्षेत्र का संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।
उपराज्यपाल ने हिमालय के भविष्य को सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए चार स्तंभों पर आधारित एक व्यापक कार्ययोजना की आवश्यकता बताई। इस कार्ययोजना में विज्ञान आधारित योजना निर्माण, जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढांचे का विकास, पुनर्योजी आजीविका को बढ़ावा देना और पर्वतीय क्षेत्रों में शून्य-कचरा अर्थव्यवस्था विकसित करना शामिल है। उनके अनुसार, इन चारों क्षेत्रों में समन्वित प्रयासों से हिमालयी क्षेत्रों को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है।
विज्ञान आधारित योजना निर्माण को इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास संबंधी निर्णय ठोस वैज्ञानिक जानकारी, पर्यावरणीय आकलन और स्थानीय परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर लिए जाने चाहिए। इससे प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा मिलेगा और विकास परियोजनाओं के कारण पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी।
जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर देते हुए उपराज्यपाल ने अपने संदेश में ऐसी विकास योजनाओं की आवश्यकता रेखांकित की, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों और पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर तैयार की जाएं। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, भवन और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास करते समय दीर्घकालिक स्थिरता तथा पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देना आवश्यक है, ताकि विकास के साथ प्राकृतिक सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
उन्होंने पुनर्योजी आजीविका को भी हिमालयी विकास की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया। इस अवधारणा का उद्देश्य ऐसी आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना है, जो स्थानीय लोगों की आय और रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी योगदान दें। पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आजीविका के अवसर विकसित करने से लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है और पर्यावरण पर अनावश्यक दबाव को कम करने में सहायता मिल सकती है।
उपराज्यपाल द्वारा प्रस्तुत चार स्तंभों में शून्य-कचरा पर्वतीय अर्थव्यवस्था का निर्माण भी शामिल है। इसका उद्देश्य कचरे को कम करना, संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण को बढ़ावा देना है। हिमालयी क्षेत्रों में स्वच्छता और कचरा प्रबंधन विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि यहां की नदियों, झीलों, जंगलों और प्राकृतिक स्थलों को प्रदूषण से बचाना जल सुरक्षा तथा जैव विविधता के संरक्षण के लिए आवश्यक है।
मनोज सिन्हा ने अपने संदेश में यह भी स्पष्ट किया कि विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है, जब विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ें। आर्थिक प्रगति और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि इन प्रयासों से प्राकृतिक संसाधनों को स्थायी नुकसान न पहुंचे। विकास की ऐसी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है, जो वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करने के साथ आने वाली पीढ़ियों के हितों की भी रक्षा करे।
13वें सतत पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन के समापन अवसर पर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और सतत विकास के मुद्दे एक बार फिर महत्वपूर्ण रूप से सामने आए। उपराज्यपाल के संदेश का मुख्य उद्देश्य यह था कि हिमालय के संरक्षण को केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय न समझा जाए, बल्कि इसे भारत की जल सुरक्षा, जैव विविधता, जलवायु स्थिरता और आर्थिक भविष्य से जोड़कर देखा जाए। विज्ञान आधारित नीतियों, पर्यावरण के अनुकूल बुनियादी ढांचे, टिकाऊ आजीविका और प्रभावी कचरा प्रबंधन के माध्यम से ही हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक सुरक्षित और लचीला भविष्य तैयार किया जा सकता है।

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