Joint Care Tips for Older Mothers After Delivery

Joint Care Tips for Older Mothers After Delivery

अधिक उम्र में मां बनने के बाद जोड़ों की सेहत का रखें विशेष ध्यान, सही देखभाल से कम हो सकती है दर्द की परेशानी

चंडीगढ़: अधिक उम्र में मां बनने वाली महिलाओं के लिए प्रसव के बाद अपनी सेहत का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। नवजात शिशु की देखभाल, नींद की कमी और शरीर में होने वाले बदलावों के बीच महिलाएं अक्सर अपनी शारीरिक परेशानियों को नजरअंदाज कर देती हैं। विशेष रूप से घुटनों, कमर, कलाई और कंधों में होने वाला दर्द उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में डिलीवरी के बाद जोड़ों की सेहत पर ध्यान देना और शरीर को पूरी तरह स्वस्थ होने के लिए पर्याप्त समय देना आवश्यक है। यह जानकारी Cocoon Chandigarh की प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. श्रुति काइंथ ने दी।

डॉ. श्रुति काइंथ के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ शरीर की मांसपेशियों की ताकत, हड्डियों की मजबूती और जोड़ों के लचीलेपन में स्वाभाविक बदलाव आने लगते हैं। ऐसे में गर्भावस्था के दौरान शरीर पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव कुछ महिलाओं के लिए शारीरिक असुविधा बढ़ा सकता है। हालांकि, हर महिला का स्वास्थ्य और प्रसव के बाद ठीक होने की प्रक्रिया अलग होती है। इसलिए उम्र को ही जोड़ों के दर्द का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं है। दर्द की सही वजह समझने और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेने से समस्या को गंभीर होने से रोका जा सकता है।

गर्भावस्था के दौरान वजन बढ़ना शरीर की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन इससे घुटनों, कमर और पैरों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, गर्भावस्था तथा प्रसव के बाद होने वाले हार्मोनल बदलाव भी शरीर की मांसपेशियों और जोड़ों को प्रभावित कर सकते हैं। प्रसव के बाद जब महिला नवजात शिशु की देखभाल में व्यस्त हो जाती है, तो बार-बार झुकना, बच्चे को गोद में उठाना और लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठना परेशानी बढ़ा सकता है। यदि पहले से जोड़ों या कमर से जुड़ी कोई समस्या हो, तो इन गतिविधियों के कारण असुविधा अधिक महसूस हो सकती है।

नवजात शिशु की देखभाल के दौरान महिलाओं को कई बार ऐसी शारीरिक गतिविधियां करनी पड़ती हैं, जिन पर सामान्य परिस्थितियों में उनका ध्यान नहीं जाता। बच्चे को पालने से उठाना, कपड़े बदलना, नहलाना और लगातार गोद में रखना कमर तथा कंधों पर दबाव डाल सकता है। इसी तरह, दूध पिलाते समय गलत मुद्रा में बैठने से गर्दन, पीठ और कलाई में दर्द होने की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए बच्चे की देखभाल करते समय शरीर की मुद्रा सही रखना महत्वपूर्ण है। बच्चे को उठाते समय कमर से अधिक झुकने के बजाय घुटनों को मोड़ना और पीठ को यथासंभव सीधा रखना मददगार हो सकता है।

प्रसव के बाद व्यायाम शुरू करने के मामले में भी सावधानी बरतना जरूरी है। कई महिलाएं जल्द से जल्द अपनी सामान्य दिनचर्या में लौटने की कोशिश करती हैं, लेकिन शरीर को स्वस्थ होने के लिए पर्याप्त समय चाहिए। विशेष रूप से अधिक उम्र में मां बनने वाली महिलाओं को अपनी शारीरिक स्थिति, प्रसव के प्रकार और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए गतिविधियों की शुरुआत करनी चाहिए। डॉक्टर की सलाह के अनुसार हल्की सैर और धीरे-धीरे की जाने वाली उपयुक्त एक्सरसाइज मांसपेशियों की ताकत बनाए रखने, शरीर की गतिशीलता सुधारने और सामान्य स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हो सकती हैं। हालांकि, कठिन व्यायाम या भारी वजन उठाने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।

जोड़ों और मांसपेशियों को आराम देने के लिए रोजमर्रा की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव भी उपयोगी साबित हो सकते हैं। महिलाओं को लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने से बचना चाहिए और अपनी सुविधा के अनुसार बीच-बीच में स्थिति बदलनी चाहिए। बच्चे को दूध पिलाते समय पीठ के पीछे तकिया लगाना तथा हाथों को उचित सहारा देना आरामदायक हो सकता है। इसी प्रकार, बच्चे को उठाते और रखते समय जल्दबाजी करने के बजाय संतुलित मुद्रा अपनानी चाहिए। यदि संभव हो, तो परिवार के अन्य सदस्यों की सहायता लेना भी जरूरी है, ताकि मां को लगातार शारीरिक मेहनत न करनी पड़े और उसे आराम करने का समय मिल सके।

डॉ. श्रुति काइंथ के अनुसार, प्रसव के बाद शरीर की रिकवरी में संतुलित और पौष्टिक आहार की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। महिलाओं को अपने भोजन में प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन डी के पर्याप्त स्रोत शामिल करने चाहिए। दालें, दूध, दही, पनीर, अंडे और अन्य प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ मांसपेशियों तथा शरीर की सामान्य रिकवरी में मदद कर सकते हैं। कैल्शियम हड्डियों की सेहत के लिए जरूरी है, जबकि विटामिन डी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में सहायता करता है। आहार में विविधता बनाए रखना, पर्याप्त पानी पीना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से पोषण संबंधी कमियों की जांच कराना भी महत्वपूर्ण है।

प्रसव के बाद पर्याप्त नींद और आराम करना भी मां के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। हालांकि, नवजात शिशु की देखभाल के कारण महिलाओं को लगातार और पर्याप्त नींद मिल पाना मुश्किल हो सकता है। नींद की कमी और थकान के कारण शरीर में दर्द तथा कमजोरी अधिक महसूस हो सकती है। ऐसी स्थिति में परिवार के सदस्यों को मां की सहायता करनी चाहिए और बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारियों को साझा करना चाहिए। जब भी अवसर मिले, महिला को आराम करना चाहिए। साथ ही, अपनी शारीरिक परेशानी को केवल थकान समझकर अनदेखा करने के बजाय समय रहते उस पर ध्यान देना चाहिए।

जोड़ों में लगातार दर्द, सूजन, अकड़न या चलने-फिरने में परेशानी होने पर चिकित्सकीय जांच कराना आवश्यक है। यदि दर्द बढ़ रहा हो, दैनिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हों या आराम करने के बाद भी राहत नहीं मिल रही हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। अचानक तेज दर्द, किसी जोड़ में अधिक सूजन या लालिमा, बुखार अथवा पैर में दर्द के साथ सूजन जैसे लक्षणों को भी गंभीरता से लेना चाहिए। प्रसव के बाद पैर में एकतरफा सूजन या दर्द के साथ सांस लेने में परेशानी अथवा सीने में दर्द होने पर तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। समय पर जांच से समस्या के कारण का पता लगाने और उचित उपचार शुरू करने में मदद मिलती है।

डॉ. श्रुति काइंथ ने बताया कि अधिक उम्र में मां बनने के बाद जोड़ों की सेहत बनाए रखने के लिए संतुलित आहार, सही शारीरिक मुद्रा, पर्याप्त आराम और डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं। महिलाओं को यह समझना चाहिए कि प्रसव के बाद उनकी अपनी सेहत भी उतनी ही अहम है जितनी नवजात शिशु की देखभाल। लगातार दर्द को उम्र या डिलीवरी का सामान्य प्रभाव मानकर सहन करना उचित नहीं है। समय पर चिकित्सकीय परामर्श, उचित देखभाल और परिवार के सहयोग से महिलाएं प्रसव के बाद स्वस्थ होने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से पूरा कर सकती हैं और अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों में धीरे-धीरे सहजता हासिल कर सकती हैं।

About The Author

Follow us